हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, 25 सितंबर 2026 को लखनऊ की शाही आसिफ़ी मस्जिद में नमाज़-ए-जुमा हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी, प्रिंसिपल हौज़ा इल्मिया हज़रत ग़ुफ़रान मआब (रह.), की इमामत में अदा की गई। नमाज़ से पहले खुत्बा-ए-जुमा में उन्होंने तक़वा, तौहीद की पहचान, अइम्मा-ए-अहलेबैत (अ) के इल्मी और नैतिक तरीक़े तथा तौहीद के व्यावहारिक तक़ाज़ों पर विस्तार से चर्चा की।
मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने पहले खुत्बे में तक़वा-ए-इलाही अपनाने पर ज़ोर देते हुए बारिश को अल्लाह की रहमत बताया और मोमिनों के लिए तक़वा व परहेज़गारी, दिलों में नूर-ए-तक़वा और दुआओं की क़बूलियत की दुआ की।
उन्होंने कहा कि खुत्बा-ए-ग़दीरिया के सिलसिले के बाद अब "तौहीद" के विषय पर एक नए सिलसिले की शुरुआत की जा रही है। उन्होंने कहा कि तौहीद इस्लाम की आत्मा और ईमान की बुनियाद है, इसलिए इसे जागरूकता और सही पहचान के साथ समझने की आवश्यकता है। इस सिलसिले में मुख्य रूप से दो पहलुओं पर चर्चा की जाएगी: तौहीद की पहचान हासिल करने के रास्ते क्या हैं और "ला इलाहा इल्लल्लाह" का इक़रार करने के बाद इंसान पर कौन-कौन सी जिम्मेदारियां आती हैं।
उन्होंने बताया कि इस सिलसिले में "तौहीद-ए-मुफ़ज़्ज़ल" को मुख्य स्रोत के रूप में सामने रखा जाएगा। मुफ़ज़्ज़ल बिन उमर जुफ़ी का परिचय कराते हुए उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से उनके संबंध और इस किताब की उनसे निस्बत पर चर्चा की। इब्न अबी अल-औजा के वाक़िए का उल्लेख करते हुए मौलाना ने इमाम सादिक़ (अ) के इल्मी तरीक़े, धैर्य और विरोधी के साथ बातचीत के अंदाज़ को उजागर किया। उन्होंने कहा कि अइम्मा-ए-अहलेबैत (अ) के अनुयायियों को भी अपने व्यवहार और बातचीत में उनके नैतिक तरीक़े को सामने रखना चाहिए।
मौलाना ने कहा कि तौहीद केवल एक सैद्धांतिक आस्था नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन से जुड़ी जिम्मेदारी भी है। उन्होंने इमाम हुसैन (अ) की कुर्बानी को तौहीद की हिफ़ाज़त के संदर्भ में बयान करते हुए तौहीदी आस्था को सही पहचान और व्यावहारिक जीवन के तक़ाज़ों के साथ समझने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
नकी को समाज की जरूरतों से जोड़ने की हिदायत
दूसरे खुत्बे में मौलाना सैयद रज़ा हैदर ज़ैदी ने तक़वा, आख़िरत में जवाबदेही और आमाल की इस्लाह की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि इंसान को अपनी नेकियों को समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए।
उन्होंने ईसाल-ए-सवाब की मिसाल देते हुए कहा कि अलग-अलग दौर में समाज की जरूरतें बदलती रही हैं। अतीत में कुआं खोदकर पानी उपलब्ध कराना एक बड़ी सामाजिक सेवा मानी जाती थी, जबकि आज शिक्षा, इलाज और अन्य बुनियादी जरूरतों के क्षेत्र में जरूरतमंदों की मदद करना भी ईसाल-ए-सवाब का ज़रिया बन सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी जरूरतमंद बच्चे की शैक्षिक फीस अदा करना या किसी मरीज के इलाज में सहयोग करना मरहूमों के ईसाल-ए-सवाब की नीयत से किया जा सकता है।
वैश्विक परिस्थितियों और मज़लूमों के समर्थन पर ज़ोर
खुत्बे के दूसरे हिस्से में मौलाना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के हालिया अधिवेशन और वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख किया। उन्होंने अमेरिकी, ईरानी और इज़राइली नेतृत्व के भाषणों तथा फ़िलिस्तीन और ग़ज़ा की स्थिति पर चर्चा करते हुए मज़लूमों के समर्थन, इस्लामी समाजों में एकता और ज़ुल्म के मुकाबले में मानवीय व नैतिक जिम्मेदारियों पर ज़ोर दिया।
उन्होंने मुस्लिम समाज, विशेष रूप से अहले सुन्नत से आपसी एकता और क्षेत्र की परिस्थितियों को गंभीरता से समझने की अपील की। उन्होंने कहा कि धार्मिक और संप्रदायगत मतभेदों से ऊपर उठकर मज़लूम इंसानों का समर्थन करना और उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना जरूरी है।
खुत्बे के अंत में मौलाना ने मज़लूमों की मदद, ज़ालिमों के ज़ुल्म के खात्मे, बीमारों की शिफ़ा, मरहूमों की मग़फ़िरत, माता-पिता पर रहमत और देश में अमन व अमान की स्थापना के लिए दुआ की। उन्होंने उलमा और बुज़ुर्गाने दीन, विशेष रूप से उन उलमा के लिए भी मग़फ़िरत की दुआ की, जिन्होंने शाही आसिफ़ी मस्जिद के मिम्बर से नमाज़ें पढ़ाई हैं। साथ ही उन्होंने अल्लाह तआला से दीन की जिम्मेदारियों को निभाने तथा इमाम-ए-अस्र (अ) की पहचान और उनकी पैरवी की तौफ़ीक़ मांगी।
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